षटतिला एकादशी 2026: मकर संक्रांति के साथ कर्म-शुद्धि का महासंयोग :
- Bhavika Rajguru

- Jan 5
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Bhavika rajguru { rajguruastroscience } lal kitab astrologer
साल 2026 की षटतिला एकादशी 14 जनवरी, बुधवार को मनाई जाएगी। यह एकादशी सामान्य नहीं, बल्कि धर्म, ज्योतिष और कर्म सिद्धांत के दृष्टिकोण से अत्यंत गहन अर्थ रखने वाली तिथि है। कारण यह है कि इसी दिन मकर संक्रांति का महापर्व भी पड़ रहा है। एकादशी और संक्रांति का यह संयोग 11 वर्षों बाद बन रहा है, जिसे शास्त्रों में अक्षय पुण्य देने वाला माना गया है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है, जिसमें तिल के माध्यम से शरीर, मन और कर्म—तीनों के शुद्धिकरण का विधान बताया गया है।

तिथि, मुहूर्त और व्रत नियम :
हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03:17 बजे से प्रारंभ होकर 14 जनवरी को शाम 05:52 बजे तक रहेगी। पूजा का श्रेष्ठ समय 14 जनवरी को सुबह 07:15 से 09:53 बजे तक रहेगा। व्रत का पारण 15 जनवरी को सुबह 07:15 से 09:21 बजे के बीच करना शास्त्रसम्मत माना गया है। व्रती इस दिन निराहार या फलाहार रहकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और रात्रि में जागरण कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं।
“षटतिला” का गूढ़ अर्थ: छह स्तरों पर शुद्धि :
‘षटतिला’ का अर्थ केवल तिल का छह प्रकार से उपयोग नहीं है, बल्कि यह छह स्तरों पर शुद्धि का प्रतीक है—शरीर, मन, वाणी, कर्म, पितृ और ग्रह।
तिल से स्नान – शारीरिक और ऊर्जात्मक शुद्धि
तिल का उबटन – नकारात्मकता और रोगों का क्षय
तिल से पितृ तर्पण – पूर्वजों की तृप्ति और पितृ दोष शांति
तिल मिश्रित जल का सेवन – आंतरिक शुद्धि
तिल का दान – शनि दोष और दरिद्रता निवारण
तिल से हवन – कर्मों की अग्नि द्वारा शुद्धि
शास्त्रों के अनुसार, इन छह उपायों से किए गए कर्म पिछले जन्मों के दोषों को भी शांत करते हैं।
मकर संक्रांति के साथ संयोग: कर्मिक रिसेट का दिन :
14 जनवरी 2026 को सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं। ज्योतिष में सूर्य अधिकार और आत्मबल के प्रतीक हैं, जबकि शनि कर्म, अनुशासन और न्याय के। एकादशी के दिन सूर्य का शनि की राशि में प्रवेश कर्मिक रिसेट (Karmic Reset) का दुर्लभ अवसर माना गया है—अर्थात पुराने पाप कर्मों का क्षय और जीवन को नई दिशा देने का योग।
शनि दोष और पितृ दोष निवारण का श्रेष्ठ दिन :
तिल का संबंध शनि ग्रह से माना गया है। इसलिए जिन जातकों पर शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा चल रही है, उनके लिए यह एकादशी अत्यंत लाभकारी है। माघ मास में तिल से किया गया तर्पण पितरों को संतुष्टि देता है, जिससे पितृ दोष के कारण आने वाली बाधाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में इस एकादशी को दरिद्रता नाशक भी कहा गया है।
ग्रह-नक्षत्र और आध्यात्मिक ऊर्जा :
इस दिन चंद्रमा अनुराधा नक्षत्र में रहेगा, जिसके स्वामी शनि हैं। यह नक्षत्र साधना, तप और आत्म-अनुशासन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। साथ ही मकर संक्रांति के कारण उत्तरायण का आरंभ भी होगा, जिसे देवताओं का दिन कहा गया है। उत्तरायण में किए गए दान और जप का फल दीर्घकाल तक प्रभावी रहता है।
किन राशियों को मिलेगा विशेष लाभ :
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस महासंयोग का विशेष सकारात्मक प्रभाव मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों पर पड़ेगा। इनके लिए करियर में स्थिरता, आत्मविश्वास में वृद्धि और मानसिक शांति के योग बन रहे हैं। वहीं मकर, कुंभ और मीन राशि वालों के लिए यह दिन शनि दोष शांति के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
क्या करें और क्या न करें :
इस दिन तामसिक भोजन, मदिरा और क्रोध से दूर रहना चाहिए। किसी भी याचक को खाली हाथ न लौटाएँ। तिल, गुड़, कंबल और अन्न का दान अवश्य करें। सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य देना और भगवान विष्णु का स्मरण इस दिन के पुण्य को कई गुना बढ़ा देता है।
षटतिला एकादशी 2026 केवल एक व्रत नहीं, बल्कि कर्म शुद्धि, पितृ तृप्ति और शनि संतुलन का दुर्लभ अवसर है। मकर संक्रांति के साथ इसका संयोग इसे एक ऐसा आध्यात्मिक द्वार बना देता है, जहाँ से व्यक्ति अपने जीवन के पुराने बोझ उतारकर नई ऊर्जा, नई दिशा और स्थायी सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर हो सकता है। यह तिथि बताती है कि जब भक्ति, दान और अनुशासन एक साथ आते हैं, तो भाग्य स्वयं मार्ग प्रशस्त करता है।




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